Wednesday, September 4, 2013

कितनी बदली दलितों की दशा

कुलदीप नायर एक दलित की हत्या कर दी गई। उसका घर उजाड़ दिया गया और उसके परिवार को जिसमें दस साल का बच्चा भी था, बाहर फेंक दिया गया। उसने उस जमीन पर झंडा फहरा कर स्वंत्रता दिवस मनाया था जो विवादित थी और जिस पर ऊँची जाति के लोगों ने जबरन कब्जा कर रखा है। उसकी हिमाकत उन लोगों को पसंद नहीं आई। भेदभाव भारत का आधार है। यहां 80 प्रतिशत आबादी पूर्वाग्रह से ग्रसित हिंदुओं की है। दलित की यह कहानी इसलिए प्रकाश में आई क्योंकि एक टीवी चैनल ने इसे दिखाया। हजारों दलित रोज इस कष्ट से गुजरते हैं। वे ऊंची जाति के घमंड और जुल्म को सहते हैं। इस सुरंग के दूसरे छोर पर कोई रोशनी नहीं है। संविधान ने 60 साल पहले छुआछूत पर पाबंदी लगा दी थी। आजादी के आंदोलन ने यह वायदा किया था कि आजादी के बाद जाति की जंजीरें तोड़ देंगे। देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने तो आवेदन पत्रों, रजिस्टरों, स्कूल में एडमिशन लेते समय और प्रवेश परीक्षाओं से जाति का कालम ही हटा दिया था। लेकिन जाति का विचार खत्म नहीं हुआ। महात्मा गांधी, राष्ट्रपिता ने दलितों का नाम हरिजन (भगवान का बेटा) रखा था लेकिन दलितों को लगा कि यह नामकरण उन्हें छोटा बताने वाला है और उन्होंने दलित कहलाना पसंद किया। इसे सामाजिक बुराई कहें या कुछ और बताएं, भेदभाव की भावना हिन्दू समाज में खत्म नहीं हुई है। आज भी एक दलित दूल्हा घोड़े पर सवार होकर वधू के घर बारात नहीं ले जा सकता है। कई जगहों पर उनके लिए रास्ते बंद हैं। जहां तक उनके रहने की जगह का सवाल है, शहरों में वे झोपड़ पटि्टयों में और ग्रामीण क्षेत्रों में गांव की सीमा से बाहर रहते हैं। कुछ लोग हिंदुओं का प्रतिनिधित्व करने का दावा करते हैं। शायद ही, वे दलितों के प्रति भेदभाव खत्म करने का कोई प्रयास करते हैं। दलित भी तो हिन्दू हैं। मैंने भारतीय जनता पार्टी को कभी भी जाति व्यवस्था का आलोचना करते हुए नहीं पाया है जबकि वे अपने को हिन्दु राष्ट्र के लिए प्रतिबद्ध बताते हैं। साफ है पार्टी का ध्यान राजनीति पर है, सामाजिक सुधारों पर नहीं। संभव है इसकी समस्या आरएसएस, जो सबसे ऊंची जाति, ब्राह्मणों का समूह है, की ओर से मिलने वाले फरमान हों। दुर्भाग्यवश, मुसलमानों और ईसाइयों में भी जाति घुस आई है। जहां तक धर्म की बात है, दोनों समुदायों में, भेदभाव की मनाही है। वे समानता का उपदेश देते हैं। लेकिन जब व्यवहार करने की बात आती है तो हिंदुओं से उनका कोई फर्क नहीं है। दोनों ही समुदायों में लोग दलितों को नीचा मानते हैं, इसके बावजूद कि हिंदुओं की जातीय घृणा से बचने के लिए दलितों ने ईसाइयत या इस्लाम अपनाया है। हालांकि उन दलितों को छूट देने का मामला बनता है जिसके बारे में मायावती, जो खुद दलित हैं, ने सुझाया है। उनकी गलती सिर्फ इतनी है कि वह सीमा से बाहर चली गईं। वह सरकारी कर्मचारियों की पदोन्नति में आरक्षण चाहती हैं। उचित ही है कि इस मांग से देश भर में हगांगा खड़ा हो गया मेरे ख्याल में, जो भी आरक्षण देना हो, वह भर्ती के समय ही मिलना चाहिए। नौकरी के दौरान पदोन्नति में आरक्षण दूसरी जाति के लोगों के मनोबल पर बुरा असर डालेगी क्योंकि वे एक कड़ी प्रतियोगिता परीक्षा पास होकर आते हैं। सिविल सेवा में जाने की इच्छा रखने वाले दलितों को भी परीक्षा देनी होती है लेकिन आरक्षण की वजह से उन्हें थोड़ी आसानी हो जाती है। देश की दो बड़ी राजनीतिक पार्टियां, भाजपा और कांग्रेस, मायावती के संशोधन का समर्थन कर रही हैं क्योंकि उनकी नजर 2014 के चुनाव के वोटों पर है। आरक्षण की मात्रा बहुत बढ़ गयी है क्योंकि ओबीसी (अन्य पिछड़े वर्गों) को भी आरक्षण दे दिया गया है। वे भी पदोन्नति में आरक्षण चाहते हैं। दूसरे समुदाय भी आरक्षण चाहते हैं। लेकिन यह संभव नहीं है क्योंकि इस पर सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दे रखा है। उसने आरक्षण की सीमा तय कर दी है कि कुल मिलाकर 49.5 से ज्यादा आरक्षण नहीं हो सकता है। अगर मायावती का संशोधन पास हो जाता है, तो अदालत इसे असंवैधानिक मान सकती है। पदोन्नति में आरक्षण के लिए लोकसभा एक विधेयक पास करने वाली है। राज्यसभा में मुलायम सिंह की समाजवादी पार्टी, जो ओबीसी की तरफ से लड़ रही थी, के विरोध के बावजूद इसे पारित कर दिया गया। ऐसा लगता है कि विरोधी राजनीतिक पार्टियों को सफलता मिल गई जब कांग्रेस पार्टी ने बहादुरी से मुकाबला किया लेकिन हार कर बैठ गई। यह सच है कि कांग्रेस को लोकसभा में बहुमत नहीं है। लेकिन वह अगर मजबूती से खड़ी होती तो बहुमत जुटा लेती। दलितों और आदिवासियों के लिए आरक्षण की व्यवस्था संविधान में की गयी है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस ओर ध्यान दिलाया है कि दलितों में मलाईदार तबके ने इसका सारा लाभ ले लिया। यही हाल ओबीसी का है। दलितों और ओबीसी के लोगों को चाहिए कि आरक्षण का लाभ वे नीचे तक जाने दें। समस्या यह है कि आवाज उठाने में आगे रहने वाले नेता ज्यादा से ज्यादा रियायतें खुद ले जाते हैं। आश्चर्य की बात है कि सरकार यह नहीं समझ रही है कि पदोन्नति में आरक्षण लाने से नौकरशाही पर क्या असर होगा जो प्रशासन का आधार है। बांटो और राज करो, यह ब्रिटिश हुकूमत का सिद्धांत था जिसने 150 साल तक भारत को गुलाम बनाए रखा। देश को एक रहना चाहिए चाहे इसे बांटने वाली शक्तियां कितनी भी मजबूत क्यों न हों। पदोन्नति में आरक्षण लाने का निर्णय एक महत्वपूर्ण निर्णय है। सरकार को राष्ट्रीय एकता परिषद की बैठक बुलानी चाहिए थी जिसका काम ही है ऐसे मुद्दों पर विचार करना। जाति एक ऐसी चीज है जो पूरे देश पर असर डालती है। देश को अंधकार युग- में नहीं धकेला जा सकता है। अमेरिका अश्वेतों को लाभ देने के लिए जिन पोजिटिव कदमों का पालन करता है वे आरक्षण से काफी बेहतर हैं क्योंकि आरक्षण के तो खत्म होने के कोई आसार नहीं हैं। लेकिन यह अलग किस्सा है कि बाबासाहेब अंबेडकर जिन्होंने संविधान बनाया, सिर्फ दस साल के आरक्षण के लिए भी अनिच्छा से राजी हुए।

No comments:

Post a Comment